डायबिटीज़ (Diabetes Mellitus) कोई ऐसी बीमारी नहीं है जो अचानक एक दिन में उत्पन्न हो जाए। यह एक धीरे-धीरे विकसित होने वाला मेटाबॉलिक डिसऑर्डर (Metabolic Disorder) है, जिसकी जड़ें हमारी आनुवंशिक विरासत, जीवनशैली, खान-पान, मानसिक स्थिति और सामाजिक परिवेश में गहराई से समाई होती हैं। प्रायः देखा गया है कि वर्षों तक शरीर में कुछ असंतुलन पनपते रहते हैं और जब वे एक निश्चित सीमा पार कर जाते हैं, तब जाकर डायबिटीज़ का स्पष्ट रूप सामने आता है।
जो व्यक्ति यह समझ लेता है कि किन परिस्थितियों, आदतों और शारीरिक अवस्थाओं से डायबिटीज़ का खतरा बढ़ता है, वह समय रहते सावधानी बरतकर इस बीमारी को रोक सकता है या कम से कम इसके प्रकट होने को कई वर्षों तक टाल सकता है।
आनुवंशिक कारण (Genetic Factors)
डायबिटीज़ के विकास में
आनुवंशिकता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यदि किसी व्यक्ति के माता, पिता या सगे भाई-बहन को डायबिटीज़
है, तो उसमें इस रोग के होने की संभावना सामान्य व्यक्ति की
तुलना में कहीं अधिक होती है। विशेष रूप से टाइप 2 डायबिटीज़
में वंशानुगत प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जाता है।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि कुछ
विशेष जीन (शरीर में इंसुलिन के उत्पादन, उसके स्राव और कोशिकाओं द्वारा उसके उपयोग को प्रभावित करते
हैं। यदि ये जीन ठीक प्रकार से कार्य न करें, तो व्यक्ति में
इंसुलिन रेसिस्टेंस या इंसुलिन की कमी विकसित हो सकती है। टाइप 1 डायबिटीज़ में भी आनुवंशिक कारक भूमिका निभाते हैं, जहाँ
कुछ जीन इम्यून सिस्टम को इस प्रकार प्रभावित करते हैं कि वह स्वयं की Beta
Cells पर आक्रमण करने लगता है।
हालाँकि यह सत्य है कि
आनुवंशिकता को बदला नहीं जा सकता, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि सही जीवनशैली अपनाकर इस जोखिम को काफी हद
तक नियंत्रित किया जा सकता है।
उम्र (Age)
उम्र बढ़ने के साथ-साथ शरीर की Metabolic Processes धीमी होने लगती
हैं। आमतौर पर 40 वर्ष की आयु के बाद डायबिटीज़ का खतरा तेजी
से बढ़ता है। इस अवस्था में मांसपेशियों की मात्रा घटने लगती है, शारीरिक सक्रियता कम हो जाती है और शरीर में चर्बी जमा होने की प्रवृत्ति
बढ़ जाती है, जिससे इंसुलिन का प्रभाव कमजोर पड़ने लगता है।
हाल के दशकों में एक चिंताजनक
तथ्य यह सामने आया है कि आधुनिक जीवनशैली के कारण डायबिटीज़ अब केवल वृद्धावस्था
की बीमारी नहीं रही। युवाओं, किशोरों और यहाँ तक कि बच्चों में भी टाइप 2 डायबिटीज़
के मामले बढ़ रहे हैं। इसका प्रमुख कारण अत्यधिक स्क्रीन टाइम, शारीरिक निष्क्रियता और अस्वस्थ खान-पान है।
मोटापा और अधिक वज़न
डायबिटीज़ के सबसे बड़े और सबसे
प्रभावशाली जोखिम कारकों में मोटापा प्रमुख स्थान रखता है। विशेष रूप से पेट के
आसपास जमा चर्बी, जिसे
Abdominal Obesity कहा जाता है, इंसुलिन
रेसिस्टेंस की मुख्य वजह बनती है। जब शरीर में Fat Cells बढ़
जाती हैं, तो वे ऐसे रसायन (Inflammatory Mediators) छोड़ती हैं जो इंसुलिन के कार्य में बाधा डालते हैं।
शरीर का वज़न मापने के लिए
प्रयुक्त बॉडी मास इंडेक्स (BMI) यदि 25 से अधिक हो, तो
डायबिटीज़ का खतरा काफी बढ़ जाता है। भारत जैसे देशों में एक विशेष स्थिति देखने
को मिलती है, जिसे “थिन-फैट” बॉडी टाइप कहा जाता है। इसमें
व्यक्ति बाहर से दुबला-पतला दिखाई देता है, लेकिन उसके पेट
और लिवर (Liver) में आंतरिक चर्बी जमा होती है, जो डायबिटीज़ के जोखिम को बढ़ाती है।
शारीरिक निष्क्रियता (Physical Inactivity)
मानव शरीर को सक्रिय रहने के
लिए बनाया गया है, लेकिन
आधुनिक जीवनशैली ने हमें लगातार बैठने का आदी बना दिया है। लंबे समय तक बैठकर काम
करना, लिफ्ट और वाहन पर अत्यधिक निर्भरता तथा व्यायाम की कमी
शरीर की इंसुलिन संवेदनशीलता (Insulin Sensitivity) को घटा
देती है।
नियमित शारीरिक गतिविधि
मांसपेशियों को ग्लूकोज़ का बेहतर उपयोग करने में मदद करती है। जब यह गतिविधि कम
हो जाती है, तो रक्त में
शर्करा का स्तर बढ़ने लगता है और धीरे-धीरे डायबिटीज़ की नींव पड़ जाती है।
अस्वस्थ खान-पान (Unhealthy Diet)
हम जो खाते हैं, वही हमारे स्वास्थ्य की दिशा तय
करता है। अत्यधिक मीठे पदार्थ, जंक फूड, प्रोसेस्ड फूड, मैदा, शक्कर और
तली-भुनी चीज़ें शरीर में कैलोरी तो बढ़ाती हैं, लेकिन पोषण
नहीं देतीं। ऐसे आहार से वजन बढ़ता है और इंसुलिन रेसिस्टेंस विकसित होता है।
कम फाइबर और अधिक रिफाइंड
कार्बोहाइड्रेट (Refined
Carbohydrates) वाला भोजन रक्त शर्करा को तेजी से बढ़ाता है। फल,
हरी सब्ज़ियाँ, दालें और साबुत अनाज (Whole
Grains) की कमी भी डायबिटीज़ के जोखिम को कई गुना बढ़ा देती है।
उच्च रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल
डायबिटीज़, उच्च रक्तचाप (High BP) और असंतुलित कोलेस्ट्रॉल अक्सर एक-दूसरे के साथ पाए जाते हैं। यदि किसी
व्यक्ति को पहले से हाई ब्लड प्रेशर है, तो उसमें डायबिटीज़
होने की संभावना लगभग दोगुनी हो जाती है।
रक्त में Triglycerides का बढ़ा हुआ स्तर और
एचडीएल कोलेस्ट्रॉल (HDL – Good Cholesterol) का कम होना
इंसुलिन रेसिस्टेंस को और अधिक बढ़ा देता है। यह स्थिति मेटाबॉलिक सिंड्रोम (Metabolic
Syndrome) का हिस्सा मानी जाती है, जो
डायबिटीज़ का एक मजबूत पूर्व संकेत है।
गर्भावधि डायबिटीज़ का
इतिहास (History of Gestational
Diabetes)
जिन महिलाओं को गर्भावस्था के
दौरान डायबिटीज़ हो जाती है, जिसे Gestational Diabetes कहा जाता है, उनमें भविष्य में टाइप 2 डायबिटीज़ विकसित होने का
खतरा बहुत अधिक रहता है।
इतना ही नहीं, ऐसे गर्भ से जन्मे बच्चों में भी
आगे चलकर मोटापा और डायबिटीज़ का जोखिम बढ़ जाता है। इसलिए गर्भावस्था के दौरान और
उसके बाद नियमित निगरानी अत्यंत आवश्यक होती है।
हार्मोनल और चिकित्सीय कारण
(Hormonal & Medical
Causes)
कुछ हार्मोनल विकार जैसे
थायरॉइड डिसऑर्डर, Polycystic Ovary
Syndrome (PCOS) और Cushing’s Syndrome डायबिटीज़
के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
इसके अतिरिक्त, लंबे समय तक स्टेरॉयड (Steroids)
या कुछ विशेष दवाओं का सेवन, तथा Pancreas
से जुड़ी बीमारियाँ जैसे Pancreatitis, इंसुलिन
उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं।
मानसिक तनाव और जीवनशैली (Stress & Lifestyle)
लगातार मानसिक तनाव, जिसे Chronic Stress कहा जाता है, शरीर में ऐसे हार्मोन (जैसे Cortisol)
का स्तर बढ़ा देता है जो रक्त शर्करा को बढ़ाते हैं। नींद की कमी,
अनियमित दिनचर्या, धूम्रपान और अत्यधिक शराब
का सेवन भी डायबिटीज़ के खतरे को कई गुना बढ़ा देते हैं।
प्रीडायबिटीज़ (Pre-diabetes)
प्रीडायबिटीज़ वह अवस्था है
जहाँ रक्त शर्करा का स्तर सामान्य से अधिक होता है, लेकिन अभी डायबिटीज़ की सीमा तक नहीं पहुँचा होता। यदि
फास्टिंग ब्लड शुगर 100–125 mg/dl हो या HbA1c हल्का बढ़ा हुआ हो, तो इसे एक चेतावनी संकेत माना
जाता है।
इस अवस्था में जीवनशैली में
सुधार न किया जाए, तो
टाइप 2 डायबिटीज़ का विकास लगभग निश्चित माना जाता है।
डायबिटीज़ के जोखिम कारक केवल
आनुवंशिक नहीं हैं, बल्कि
वे हमारी रोज़मर्रा की आदतों और जीवनशैली से गहराई से जुड़े हुए हैं। परिवार का
इतिहास बदला नहीं जा सकता, लेकिन वजन नियंत्रण, नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन के माध्यम से डायबिटीज़ के खतरे को काफी हद
तक कम किया जा सकता है।
जो लोग इन जोखिम कारकों के
संपर्क में हैं, उन्हें
नियमित रूप से ब्लड शुगर की जाँच करानी चाहिए, ताकि समय रहते
बीमारी की पहचान हो सके और स्वस्थ जीवन की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें।
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